नकटी गांव उजड़ा, लेकिन सवाल अब भी खड़े हैं: 85 परिवारों को फ्लैट मिले, पर क्या उनका जीवन भी बस पाएगा?
85 परिवारों को EWS फ्लैट तो मिले, लेकिन रोज़गार, शिक्षा, पशुधन और बड़े परिवारों के पुनर्वास पर अब भी कई सवाल कायम।

रायपुर/नवा रायपुर। नवा रायपुर के नकटी गांव में विधायक कॉलोनी निर्माण के लिए हुई प्रशासनिक कार्रवाई के बाद 85 परिवारों को उनके घरों से विस्थापित कर सेक्टर-30 स्थित ईडब्ल्यूएस (EWS) आवासों में स्थानांतरित कर दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि यह शासकीय भूमि पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई थी और प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आवास उपलब्ध करा दिए गए हैं।
लेकिन मलबा हटने के बाद अब असली लड़ाई शुरू हुई है। यह लड़ाई सिर्फ सिर पर छत की नहीं, बल्कि रोज़गार, शिक्षा, पशुधन, सामाजिक जीवन और सम्मानजनक पुनर्वास की है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अब इन समस्याओं का भी उतनी ही तेजी से समाधान करेगी, जितनी तेजी से मकान तोड़े गए?
क्या पुनर्वास की पूरी तैयारी पहले होनी चाहिए थी?
प्रभावित परिवारों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विस्थापन तय था, तो क्या पहले पुनर्वास की सभी व्यवस्थाएं पूरी नहीं की जानी चाहिए थीं?
लोगों का कहना है कि यदि रहने की व्यवस्था, परिवार के अनुसार आवास, रोजगार, स्कूल, परिवहन और अन्य सुविधाएं पहले सुनिश्चित कर दी जातीं, तो आज इतनी परेशानियां सामने नहीं आतीं।
एक जैसा फ्लैट, लेकिन परिवार अलग-अलग
नकटी गांव में किसी का मकान छोटा था तो किसी का बड़ा। कोई 400-500 वर्गफीट में रहता था तो किसी ने वर्षों की मेहनत से कई मंजिला मकान बनाया था। कई घर पैतृक थे, तो कुछ प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं के तहत बने थे।लेकिन पुनर्वास के दौरान सभी परिवारों को एक जैसा 1 बीएचके ईडब्ल्यूएस फ्लैट आवंटित किया गया।
अब सवाल उठ रहा है—
दो सदस्यों वाले परिवार और 12-15 सदस्यों वाले संयुक्त परिवार को एक जैसा आवास कैसे पर्याप्त होगा?
क्या पुनर्वास में परिवार के आकार और जरूरतों का आकलन किया गया?

पशुधन का क्या होगा?
गांव के कई परिवारों के पास गाय, बछड़े और अन्य पशुधन थे, जो उनकी आय और जीवन का हिस्सा थे।
फ्लैट संस्कृति में इन पशुओं को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिन परिवारों की आजीविका पशुपालन से जुड़ी थी, उनके लिए सरकार की क्या योजना है?
महिलाओं का रोजगार भी संकट में
गांव की अनेक महिलाएं आसपास के खेतों, घरों, दुकानों और स्थानीय बाजारों में काम कर परिवार की आय बढ़ाती थीं। विस्थापन के बाद उनके कार्यस्थल दूर हो गए हैं। क्या उनके रोजगार की भरपाई के लिए कोई योजना बनाई गई है?
या अब उन्हें रोज़गार के लिए नए संघर्ष का सामना करना पड़ेगा?
बच्चों की पढ़ाई पर भी बड़ा सवाल
गांव के बच्चे आसपास के स्कूलों में पढ़ते थे। अब नए स्थान पर बसने के बाद—
- क्या उनका स्कूल बदलेगा?
- क्या परिवहन की व्यवस्था होगी?
- क्या उनकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी?
इन सवालों का स्पष्ट समाधान अभी सामने नहीं आया है।
दिहाड़ी मजदूरों की रोज़ी-रोटी पर असर
- कई परिवार मजदूरी कर अपना घर चलाते थे।
- उनका काम गांव और आसपास के क्षेत्रों में ही था।
- विस्थापन के बाद रोज़ काम तक पहुंचना भी उनके लिए अतिरिक्त खर्च और परेशानी का कारण बन सकता है।

सिर्फ मकान देना ही क्या पुनर्वास है?
विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्वास का अर्थ केवल आवास देना नहीं होता।
सम्मानजनक पुनर्वास में शामिल होते हैं—
- परिवार के अनुरूप आवास
- रोजगार की निरंतरता
- बच्चों की शिक्षा
- स्वास्थ्य सुविधाएं
- पशुधन और आजीविका की व्यवस्था
- सामाजिक और सामुदायिक जीवन का संरक्ष
- यदि ये व्यवस्थाएं नहीं हैं, तो पुनर्वास अधूरा माना जाता है।
अब जिम्मेदारी किसकी?
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन 85 परिवारों की आगे की समस्याओं का समाधान कौन करेगा?
- बड़े परिवारों के लिए पर्याप्त आवास कौन सुनिश्चित करेगा?
- महिलाओं के रोजगार का विकल्प कौन देगा?
- बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
- पशुधन रखने की व्यवस्था कौन करेगा?
- रोज़गार और परिवहन की समस्या कौन हल करेगा?

सबसे बड़ा सवाल… क्या समाधान भी उतनी ही तेजी से होगा?
जिस तेजी से बुलडोजर चले, मकान गिरे और लोग अपने आशियाने छोड़ने को मजबूर हुए, अब लोगों की उम्मीद है कि उसी तेजी से उनकी समस्याओं का भी समाधान हो।
क्योंकि विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसके साथ विस्थापित लोगों का सम्मानजनक, मानवीय और पूर्ण पुनर्वास भी सुनिश्चित हो।



